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कहानी- यथार्थ बोध (Short Story- Yatharth Bodh)

"प्रमेश उपहार में दी गई वस्तु में उपहार देने वाले का अपना अंश भी होता है, अपना व्यक्तित्व भी होता है."यह सुनकर अंदर तक भीग गया था प्रमेश, कुछ भी न बोल पाया था वह. इससे पहले की‌ कोई शब्द निकले प्रियंका धीरे से बुदबुदा उठी, "आई लव यू प्रमेश." 

मैं अभी तक अविवाहित हूं प्रमेश और... आगे भी अविवाहित रहने का फ़ैसला कर लिया है. वह जैसे-जैसे पत्र पढ़ता गया उसके चेहरे पर कुछ गाढ़ी लकीरे उभरती चली गईं. लकीर, वैसी लकीरें जैसी उन क्षणों में चेहरों पर उभरनी शुरू होती है, जब सीमा के परे कुछ ऐसा हो जाता है, जिसके बारे में सोचा तो जाता है पर बहुत नज़दीक से, एक अति सीमित दायरे में.
लेकिन फिर भी पहली दो पंक्तियां वह बार-बार पढ़ता गया और अतीत में खो गया प्रियंका के पत्र में.
प्रियंका... कितना शोख नाम, सारे जहां का प्यार, चंचलता समेटे हुए सा और प्रमेश को ख़ूब भा गया था उन दिनों और प्रियंका को भी भा गया था प्रमेश का व्यक्तित्व. सिर के भूरे बालों से लदा, लंबा गेहुए रंग का चेहरा और साथ ही ऊंचा क़द... अनायास ही प्रियंका के मुंह से निकल पड़ा, "कितना फबता है प्रमेश."
एक रोज़ विश्वविधालय चित्रकला प्रदर्शनी में अनायास ही शुरू हो गया बातचीत का सिलसिला, जो बढ़ते-बढ़ते मिलने-मिलाने के व्यवस्थित सिलसिले तक जा पहुंचा. प्रमेश को कला से लगाव था और प्रियंका को उसके चित्रों से. काफ़ी प्रशंसा किया करती थी अपनी सहेलियों के बीच उसके चित्रों की, और उसके चित्र भी तो काबिल-ए-तारीफ़ हुआ करते थे. ख़ूब चर्चे हुआ करते थे चित्रों के साथ दोनों के संबंधों के बीच.
और एक दिन प्रमेश पूछ ही बैठा प्रियंका से, "अगर कोई तुमसे कहे कि मैं तुमसे प्यार करता हूं और तुम भी प्यार करती हो तो क्या कहोगी?"
"मैं भाग जाऊंगी..." और सचमुच प्रियंका भागने का उपक्रम करने लगी. लेकिन प्रमेश ने हाथ पकड़कर पास खींच लिया और रख दिया विवाह का प्रस्ताव उसके समक्ष.
प्रियंका खिलखिला पड़ी. प्रस्ताव सुनकर‌ प्रमेश को लगा स्थायी बहार आ गई है उसकी ज़िंदगी में पर... ऐसा न हो सका.
"क्या विवाह करना ज़रूरी है प्रमेश. इतनी भी क्या जल्दी है विवाह के बंधन की. हम दोस्त बनके नहीं रह सकते क्या? फिर ऐसी कौन सी ज़रूरत है, जो हम बिना विवाह के पूरी नहीं कर सकते." प्रमेश कुछ आगे कहना ही चाह रहा था कि प्रियंका बीच में ही बोल उठी, "कहीं दुल्हन से भी सुंदर दूल्हा होता है?" उसके गले में बांहें डाल झूल सी गई यी प्रियंका.
पत्र पढ़ने के बाद मोड़ते हुए उसे जेब में संभालकर रख लिया प्रमेश ने. पहले भी कई बार वह ऐसा कर चुकी थी, पर अब प्रियंका के बारे में उसका ऐसा सोचना उचित है क्या? क्या भुला सकेगा वह उसे? शायद कभी नहीं... भुलाने की क्रिया तो शायद याद करने की प्रक्रिया का एक अंग है.

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एक रोज़ गांधी पार्क में प्रमेश की छाती पर सिर रखे प्लेन को उड़ते देखकर कहने लगी, "प्रमेश, मैं एयर होस्टेस बनना चाहती हूं."
"तुम और एयर होस्टेस... स्कूटर ज़रा तेज़ करो तो डरने लगती हो."
"नहीं प्रमेश, में सीरियसली कह रही हूं."
उसे गंभीर देखकर प्रमेश भी गंभीर होकर बोल उठा, "पर प्रियंका जानती हो एयर होस्टेस के लिए अनमैरिड होना ज़रूरी है."
"हां जानती हूं."
"परंतु हमारा विवाह..."
"तुम पुरुष तो यही चाहते हो कि स्त्री हमेशा
उसकी ग़ुलाम बनी रहे. वह अपने पैरों पर खड़ी न हो. स्त्री को तुम लोग घर की चहारदीवारी में क़ैद रखकर बच्चे पैदा करने वाली मशीन बनाकर रखना पसंद करते हो..." और वह बिफर सी पड़ी.
प्रमेश राय
अवर सचिव
गृह मंत्रालय, भारत सरकार
कितना वरिष्ठ लगता है यह ओहदा और उससे भी ज़्यादा कौतुहल भरा कि किस तरह लिखता होगा प्रमेश लाल स्याही से नीली स्याही से लिखे मसौदों पर, जो सदैव नीली स्याही से सही करता रहा अपने सवाल इस डर से कि कहीं लाल स्याही...
उन दिनों भी हल नहीं ढूंढ़ पा रहा था प्रमेश, दरअसल वह सवाल ही नहीं चुन पा रहा था. दो सवालों में कोई एक ही हल करना था. अजीब सी दुविधा में फंसा था प्रमेश, एक तरफ़ प्रियंका का शोखी भरा चेहरा और उसका उल्लासपूर्ण समर्पित प्रेम तथा दूसरी तरफ़ घरवालों का शादी के लिए दबाव डालना, घरवालों के प्रस्ताव. आख़िर एक दिन फिर से हिचकिचाते हुए प्रमेश ने अवगत करा ही दिया, घरवालों के विचार और ख़ुद की अंतरइच्छा से, लेकिन प्रियंका ने निर्देयता से ठुकरा दिया प्रस्ताव और पल्ला झाड़कर खड़ी हो गई.
लुढ़क पड़ा था प्रमेश, कहना चाहते हुए भी कुछ न कह सका. शब्दकोश चूक गया था शायद या अर्थहीन हो गए थे शब्द उसके. शायद गला ही इस क़दर रुद्ध हो गया था कि स्वर निकल ही नहीं पा रहे थे. आसमां और ज़मीं के बीच में रहने वाले प्रमेश ने पहली बार आज ज़मीन के अंदर के दर्द को जाना, पहले तो प्रियंका का नकारात्मक टाल-मटोल था. अब तो स्पष्ट अस्वीकृति. किस मुंह से, किस विश्वास से रुकते वह, और कब तक? आख़िर मम्मी के स्नेहयक्त आग्रह के समक्ष दे ही दी अनचाही स्वीकृति. और न चाहते हुए भी, एक दिन छपकर आ गए उसके विवाह के कार्ड.
एकाएक उसका ख़्याल टूटा, उसे लगा कि कुछ ज़्यादा ही सोचने लगा है, शायद उसकी आंखों से लग रहा है कि वह परेशान है. सो चेहरा धो लेने के लिए वह वॉशबेसिन की तरफ़ बढ़ गया. ऊपर लगे शीशों से प्रतिबिम्ब को देख उसे महसूस हुआ कि उसके चेहरे से पता चल रहा है कि वह जेब में रखे पत्र से आशंकित है. घबराकर ढेर सारा पानी अपने चेहरे पर डाल लिया दोनों हाथों से. शीशे में उसके ही चेहरे ने कहा, "कहीं पानी से चेहरा धो डालने से पुरानी यादें थोड़े ही धुल जाती हैं." यूं ही उसकी नज़र वहीं कोने में बैठे एक ख़ूबसूरत से कबूतर पर पड़ी. प्रियंका भी तो उपहार के तौर पर नगों से जड़ा एक कबूतर लाई शादी की पार्टी पर उस दिन.

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"यह मेरी पत्नी है शेफाली." प्रमेश ने प्रियंका का परिचय कराते हुए कहा.
"ओह प्रमेश बहुत लकी हो तुम, तुम्हें इतनी ख़ूबसूरत पत्नी मिली है." इससे आगे वह कुछ और बोले कि शेफाली बोल उठी, "सचमुच भाग्यशाली तो मैं हूं, जो मुझे इतना अच्छा पति मिला है." और उन दोनों को अकेला छोड़कर दूर से आई एक सहेली से बातें करने लग गई शेफाली. प्रमेश दुविधा में था क्या बोले उससे, मौन को तोड़ा प्रियंका ने ही, "प्रमेश यह उपहार तुम्हारे लिए लाई हूं." और ख़ूबसूरत नगों से जड़ा चांदी का कबूतर रख दिया प्रमेश के हाथों में तो चौंक पड़ा. सोचने लगा कि प्रियंका के कमरे में हर चीज़ अकेली क्यों है, जो जोड़े में होती है. यह चीज़ अकेली क्यों है, यह भी शायद... बोल ही पड़ा वह, "पर एक ही..."
"प्रमेश उपहार में दी गई वस्तु में उपहार देने वाले का अपना अंश भी होता है, अपना व्यक्तित्व भी होता है."
यह सुनकर अंदर तक भीग गया था प्रमेश, कुछ भी न बोल पाया था वह. इससे पहले की‌ कोई शब्द निकले प्रियंका धीरे से बुदबुदा उठी, "आई लव यू प्रमेश."
वॉशबेसिन से लौटने के साथ प्रमेश अतीत से भी लौट आया, सोचने लगा इतने वर्षों बाद, कोसों दूर बैठी प्रियंका के बारे में सोचना क्या उचित है?
उसे लगा कि शीशे के बाहर केबिन में बैठे लोग उसकी ही तरफ़ देख रहे हैं. क्या उसके चेहरे से परेशानी झलक रही है या यह उसकी ग़लतफ़हमी है कि लोग घूर रहे हैं उसे.
प्रियंका के पत्र को लेकर इतना ज़्यादा नहीं सोचना चाहिए. वह सोच नहीं पा रहा था कि कैसे प्रियंका और उसके पत्र के बारे में सोचना छोड़ दे. उसके तारतम्य को एकाएक तोड़ा मेहरा ने, जो केबिन का दरवाज़ा खोलते हुए अंदर आया था. यह कहते हुए कि कैसी तबियत है अब बंटी बेटे की, तो उनका बेटा बंटी बीमार है, साथ ही अच्छा लगा कि मेहरा का सोचना है कि वह शायद बंटी की बीमारी की वजह से परेशान है. बड़ा सुकून मिला यह सोचकर, मेहरा और सब अगर उसे परेशान देख रहे हैं तो केवल बंटी की वजह से, न कि प्रियंका के पत्र की वजह से. उसने मेहरा को संक्षिप्त-सा उत्तर दिया, "अब ठीक है वह. बस कुछ हरारत बाकी है." तो मेहरा पूछ बैठा, "क्या चलोगे नहीं आज सेकंड सैटरडे है."
"हां, हां..." वह चौंकते हुए बोला. उसे याद नहीं रहा था की आज सेकंड सेटरडे है‌ यानी कि हॉफ डे. ओह क्या होता जा रहा है. पहले कितनी बेसब्री से इंतज़ार किया करता था इस दिन का, वह भी और शेफाली भी. शादी के शुरू के महीने की बात है घर से स्कूटर बाहर निकालकर स्टैंड पर खड़ा करते ही रहस्यमय स्वर में शेफाली से कहता, "जानती हो आज क्या है?"
"क्या?" शेफाली जिज्ञासा से पूछ पड़ती, तो वह उसे अपनी बांहों में जकड़कर कहता सेकंड सैटरडे यानी कि हॉफ डे यानी डे ऑफ लव."
ऑफिस से बाहर आते वक़्त सोचने लगा, क्यों वह बात नहीं रही अब शेफाली में, न प्यार की गर्मी है और न ही... उसका मन बाकी वक़्त घर में गुज़ारने को नहीं कर रहा था. फिर से एक बार उसने प्रियंका के पत्र को सहलाया, गोया पत्र न होकर प्रियंका के घने, काले बाल हों...
घर के दरवाज़े की बेल दबाने पर दरवाज़ा शेफाली ने ही खोला. शायद उसे भी बेटे की बीमारी के कारण ध्यान नहीं था कि आज सेकंड सैटरडे है. उसे शेफाली की कनपटी पर सफ़ेद बाल कुछ ज़्यादा ही सफ़ेद लगने लगे. जेब में हाथ डालकर पत्र को सहलाया और कसकर मु‌ट्ठी में बंद कर लिया प्रमेश ने. वह पूछ भी न पाया कि कैसा है बेटा? ख़ुद ही शेफाली बोल पड़ी, "डॉक्टर कालरा आए थे, दवाई दे गए. काफ़ी आराम है अब बंटी को." वह कोट को हैंगर में टांग कर पलंग पर आकर लेट गया. कोट टांगते वक़्त धीरे से उसने पत्र को एक बार चूम लिया.

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शेफाली ट्रे में चाय और प्लेट में केक रखकर ले आई, प्रमेश को लेटा देखकर माथे पर हाथ रखकर बोली, "अरे आपको तो बुखार है." और भाग कर टेबलेट लेकर आ गई साथ में पानी भी. पानी के साथ दवाई खिलाकर कंबल ओढ़ा दिया. फिर प्रमेश को पता ही नहीं चला कि कब वह सो गया.
शेफाली की आवाज़ से प्रमेश की आंख खुली तो देखा शेफाली सूप, मक्खन लगे, सिंके ब्रेड के स्लाइस लेकर खड़ी थी. उसने बंटी को तो खिला दिया था और प्रमेश के बालों को सहलाते हुए उठा रही थी.
प्रमेश उठा और दबे कदमों से कोट के पास आकर प्रियंका का पत्र निकाला कुछ देर पत्र को देखता रहा, फिर उसके कई टुकड़े कर खिड़की से बाहर फेंक दिया. थोड़ी देर खिड़की से छोटे-छोटे टुकड़ों को उड़ते हुए सड़क पर गिरते हुए देखता रहा फिर वह हौले से खिड़की का पर्दा सरका कर पलंग के पास आ गया, प्यार से बंटी के सिर पर हाथ फेरकर हौले से चूम लिया कि जग न जाए और उसे कंबल ओढ़ा दिया.
शेफाली को अपने पास खींचकर बांहों में भर लिया और बुदबुदा उठा, "यू आर सो स्वीट, आई लव यू, ओ डार्लिंग! आई लव यू."
- प्रमिला अहलूवालिया

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