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कहानी- उबटन के रंग हज़ार (Short Story- Ubtan Ke Rang Hazar)

वह जब भी अपने चेहरे पर उबटन मलती थी, तो वह हमेशा उससे यही कहते थे, "श्यामा मेरी बात काग़ज़ पर लिखवाले. ख़ूबसूरत औरत कभी बूढ़ी नहीं होती." 

शाम बीतते ही सारा आंगन मोहल्ले की महिलाओं से भर गया था. ब्याह वाली लड़की को उबटन जो लगाना था. श्यामा बुआ कटोरे में बेसन, हल्दी और तेल का उबटन बनाकर ले आई थीं. इधर ब्याह वाली लड़की के गोरे तन पर बेसन लग रहा था, उधर स्त्रियां ढोलक पर बधाई के गीत गा रही थीं.
साडा चिड़िया दा चंबा ए, बाबुल असां उड़ आना साडी लम्बी उड़ारी वे, बाबुल केड़े देस जाना... घर के क़रीब एक नई ब्याही बहू भी रहती थी, सबके कहने पर जब उसने गाना शुरू किया तो फिर ऐसा समा बंधा कि बगल के कमरे में बैठे मां के भी कान खड़े हो गए. उसकी आवाज़ इतनी बुलंद और सधी हुई थी कि मां ने गप्पें मारना छोड़कर आंगन से आने वाली आवाज़ की तरफ़ ध्यान लगा दिया. गाने वाली ने ग़ुलाम फ़रीद की चार पंक्तियां इस अंदाज़ में गाई कि श्यामा बुआ तो बस दीवानी सी हो गई थीं, पंजाबी की उन लाइनों का मतलब कुछ इस प्रकार था-
क़सम खुदा की तू मुझे सुंदर लगता है
फिर इश्क़ में ये जोर-ओ-ज़ुल्म क्यों
तूने मेरी पीठ पर हिज़्र के कोड़े बरसाए हैं
पर मेरी इन आंखों में तुझे फिर भी प्यार से देखा है
जितनी चोटें मेरे तन पर लगी हैं
उसमें से एक भी तेरे तन पर लगाती
तब तुझे पता चलता कि प्यार क्या होता है
ग़ुलाम फ़रीद सच कहता है
दिल उसे ही दो, जिसे प्यार की कदर करनी आती हो...

श्यामा बुआ ने गाने वाली के माथे को चूमा और लड्डू, बताशे, रेवड़ी का बड़ा सा लिफ़ाफ़ा उसकी गोद में रखकर कमरे में चली गईं. श्यामा बुआ को जैसे कुछ बीता हुआ याद आने लगा था. उन्होंने हाथों में पकड़ा उबटन का कटोरा एक तरफ़ रख दिया और उबटन से सने हाथों को देखकर अतीत के ख़्यालों में डूब गईं.
दीवान फतेहचन्द की कोठी में एक बार श्यामा बुआ ने भी ऐसा ही गीत गाया था, बुल्ले शाह का लिखा हुआ, जिसका मतलब था-

तेरे इश्क़ में मैं कंजरी बनकर नाचूं तो भी मुझे कोई शर्म नहीं, मैं ईद कैसे मनाऊं, मेरा प्यार मुझसे रूठा हुआ है, मैं हज क्यों जाऊं, अपने प्रेमी को देख लूं तो समझूंगी मेरा हज हो गया...

दूसरे दिन ही श्यामा बुआ की मां के पास अपने बेटे का रिश्ता लेकर दीवान फतेहचन्द की बीवी ख़ुद आई थीं. भला इतने बड़े घर का रिश्ता पाकर कोई कैसे इनकार करता. सब कुछ तय हो गया और श्यामा बुआ दुल्हन बन दीवान फतेहचन्द की कोठी में आ गई थीं. ख़ूबसूरत, गोरी-चिट्टी, बड़ी-बड़ी आंखों वाली श्यामा बुआ, जो उम्र की ढलान में भी इतनी ख़ूबसूरत लगती हैं, उस वक़्त तो क़यामत रही होंगी. आज ग़ुलाम फ़रीद का गीत उस नई बहू के मुंह से सुनकर सोचने लगी थीं...
आज वह ज़िन्दा होते तो गाने वाली बहू को सोने की हंसुली बनवा देते. ऐसे गीत सुनकर तो वह बेक़रार हो उठते थे. उसके हाथों को थाम कर कहते थे, "श्यामा जब तू बुल्ले शाह बोलती है, तो मुझे लगता है तेरी आवाज़ में अपनी आवाज़ मिला दूं, पर अरे बावरी ऊपरवाले ने मुझे तेरे जैसा गला नहीं दिया."
वह जब भी अपने चेहरे पर उबटन मलती थी, तो वह हमेशा उससे यही कहते थे, "श्यामा मेरी बात काग़ज़ पर लिखवाले. ख़ूबसूरत औरत कभी बूढ़ी नहीं होती."
अपने पति की बात सुनकर श्यामा कितनी ख़ुश होती थी. उसने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे इतना अच्छा पति मिलेगा.
श्यामा को याद आने लगा, जब पहली बार उबकाई आने की बात अपने पति से कही थी, तो वह कितना ख़ुश हुए थे, शहर से जाकर श्यामा के लिए जाने क्या-क्या ख़रीद लाए थे.
जब सास को पता चला तो उसने बहू को प्यार से फटकारते हुए कहा था, "बहू ऐसी बातें सास से कही जाती हैं, तूने मुझसे छुपाए रखी."
जिस दिन गोद भराई की रस्म हुई थी, श्यामा की सास ने दो मोटे सोने के कड़े उसकी कलाई में डाल दिए थे.
जिस दिन श्यामा का पहला बेटा हुआ था, गांव की तीन-तीन दाइयां फतेहचन्द की कोठी में आ गई थीं, बच्चा होने के बाद कोई तीन माह तक सास ने उसके शरीर की मालिश करवाई थी, तभी तो श्यामा को देखकर लगता ही नहीं था कि वह मां भी बनी है.
श्यामा का पति उसके रूप का दीवाना था, पर भरी जवानी में श्यामा को वह छोड़ जाएगा, यह तो उसने कभी सोचा भी नहीं था.
उस रात जैसे ही खाना खाकर उसके पति उसके क़रीब आकर लेटे थे, उनके सीने में जोरों का दर्द उठा था. गांव के बड़े से बड़े हक्रीम को बुलाया गया था. रातों-रात तांगा कसवा लिया था उसे शहर ले जाने के लिए, पर जैसे ही उसके पति को तांगे पर लिटाने लगे बेचारे ने वहीं प्राण त्याग दिए थे.
श्यामा के ज़ेहन में पुरानी यादें उभरने लगीं. आंखों में आए आंसुओं को उसने पोंछा और शीशे में अपने झुर्रियों भरे चेहरे को देखा, एकाएक उबटन से सना हाथ श्यामा के चेहरे पर आ गया. उसे याद आया, कैसे वह घंटों गुसलखाने में उबटन मलकर बैठी रहती थी और उसका पति उसे देखकर कहता था, "श्यामा आज तो तेरे चेहरे की रंगत देखकर चांद भी शरमा जाएगा."
तभी किसी ने बाहर से आवाज़ लगाई, "श्यामा बुआ, उबटन का कटोरा तो दे दो, ब्याह वाली लड़की को उबटन लगाना है."
- तेजेन्द्र खेर

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