शायद कुछ दिन एक साथ एक छत के नीचे गुज़रे दिनों की परछाइयां ऐसा करने से रोक रही थीं. लेकिन फिर भी दोनों क़रीब-क़रीब रहना चाहते थे. जिससे ज़ाहिर है कि सिर्फ़ क़ानून और समाज का डर एक रिश्ते को जन्म नहीं लेने दे रहा था. वरना उनकी आत्मा व मन की अदालत को कुछ भी ग़लत नहीं लग रहा था.
माधवी ने अपने पति मनोज से तलाक़ लेने का जिस दिन निश्चय किया उसी दिन से मांग में सिंदूर भरना, माथे पर सुहाग की बिंदिया लगाना और गले में मंगलसूत्र पहनना छोड़ दिया था. तलाक़ के काग़ज़ों पर दस्तख़त करके क़ानूनी रस्मों को पूरा होने का भी इंतज़ार करने की ग़लती नहीं की अपनी समझ से.
एक साल पहले ही तो वह दुल्हन बनी थी. गृहस्थी की ज़िम्मेदारियों को संभालने, और मां बनने पर विवाहित होना दिखने लगता है, लेकिन माधवी अभी इन दोनों ही बातों से कोसों दूर थी. लिहाज़ा वह सिंदूर-बिंदी और मंगलसूत्र से निजात पाकर फिर एक बार कुंआरी ही तो लगने लगी थी. कोई भी चिह्न तो उसे सुहागन करार देने के लिए शेष नहीं था. हाथों की मेहंदी का रंग और महावर तो कब के छूट चुके थे. तभी तो कुणाल ने उसे कुंआरी समझ कर मदभरी नज़रों से देखा था- अपने घायल मन के लिए मरहम बनाने की नीयत से.
कुणाल तलाक़ की धुंध में घिरा हुआ था, जिसमें माधवी भी भटक रही थी. यह वह धुंधलका है जो मन की उथल-पुथल को कभी ख़त्म नहीं होने देता. सोच का कोहरा छंटने तक वो ज़िंदगियां, एक घर टूट कर चूर-चूर हो जाते है और फिर वही किरचे एहसासों की ताज़िंदगी चुभती रहती है.
कभी-कभी लोग संबंधों की कोमलता को नज़रअंदाज़ कर ऐसे फ़ैसलों में भी लाभ-हानि वाली व्यापारिक समझ का ही उपयोग करते हैं. यही कुणाल के माता-पिता ने भी किया. मामला अभी अदालत के आंगन में ही था कि वह लोग दरवाज़े पर दुबारा शहनाइयां बजवाने की तैयारी करने लगे. और शुरू हो गई कुणाल के लिए एक अदद ऐसी लड़की की खोज जो कुंआरी, विधवा या तलाक़शुदा बेशक हो, पर पुत्रवती न हो.
यही हाल माधवी का भी था. उसने ख़ुद ही तलाक़ की पहल की थी. लेकिन उसका फ़ैसला भी अभी अदालत की न्याय की तराजू पर टंगा हुआ था. दोनों पलड़े डगमग हो रहे थे. जज एक की हार और एक की जीत तभी सुना सकता था जबकि न्याय की तराजू स्थिर होकर हार-जीत का ऐलान करती.
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कितनी कठिन होती हैं वे रातें जब पति-पत्नी तलाक़ होने के पहले से ही अलग रहकर फ़ैसले का इंतज़ार करते हैं. लेकिन यहां बात कुछ और ही थी- पति से तलाक़ की क़ानूनी कार्यवाही के बाद माधवी अपनी बहन के घर आ गई थी. न जाने किस विचार से. तलाक के बाद अनिश्चित जीवन की चिंता से उबरने के लिए या दुबारा कुंआरी बन जाने की ख़ुशी को जीने के लिए यह तो वही जानती होगी. लेकिन कुणाल की ओर ऐसी परिस्थितियों में उसका आकर्षित होना उसके अंदर कोई दर्द या चिंता का होना नहीं बताता, न ही मानसिक द्वंद में फंसी एक भारतीय नारी का चित्र स्पष्ट करता है.
कुणाल और माधवी की तो बात ही और थी. उनके माता-पिता, भाई-भाभी व बहन-जीजा सभी उनकी चाहत को सही समझ कर दो टूटे घरों के टुकड़ों को जोड़कर एक तीसरा घर बनाने के लिए बख़ुशी तैयार थे. दोनों के ही माता-पिता चुपचाप तलाक़ के केस के फ़ैसले के पहले ही सगाई करना चाहते थे. लेकिन माधवी और कुणाल इस बात के लिए तैयार नहीं हुए. अदालती फ़ैसले के बगैर वो ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते थे. शायद कुछ दिन एक साथ एक छत के नीचे गुज़रे दिनों की परछाइयां ऐसा करने से रोक रही थीं. लेकिन फिर भी दोनों क़रीब-क़रीब रहना चाहते थे. जिससे ज़ाहिर है कि सिर्फ़ क़ानून और समाज का डर एक रिश्ते को जन्म नहीं लेने दे रहा था. वरना उनकी आत्मा व मन की अदालत को कुछ भी ग़लत नहीं लग रहा था.
वक़्त कब किधर का रूख कर ले इसका पता कभी किसी को नहीं लगता. उनके बहुत चाहने पर कि वे क़रीब रहें दूर होना ज़रूरी हो गया. कुणाल को अपना अलग घर मिल गया था जिसकी कोशिश में था वह. इसलिए अब उसका अपने भाई के घर से जाना निश्चित था. जिसका नतीज़ा था दोनों का घर होना. माधवी और कुणाल दोनों के ही घरवाले सब कुछ जानते थे. उनके रिश्ते के लिए भी तैयार थे. लेकिन उसमें अभी देरी थी. फिर भी माधवी अपनी बहन के यहां रुकना चाहती थी, जिससे कुणाल के क़रीब रह सके. लेकिन कुणाल के जाने की बात से माधवी के दिल पर जो बीत रही थी वह उसकी बहन से छिपी न थी. अतः उसने इन दोनों को अकेले मिलने का अवसर देने की सोच कर ड्रामा देखने के लिए भेज दिया.
माधवी कुणाल के साथ स्कूटर पर बैठी थी. उसे कुणाल की जगह अपना पति मनोज दिख रहा था. वह उन दिनों की यादों में खो गई, जो उसने मनोज के साथ बिताए थे. उसका जी चाहा कि वह कुणाल की कमर में उसी तरह हाथ डाल कर बैठ जाए जैसे मनोज के साथ बैठती थी, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी. उसे ख़्याल आने लगा कि कुणाल, मनोज नहीं एक अजनबी मर्द है. स्कूटर सड़क पर भागता रहा और माधवी के विचार मनोज और कृणाल की तुलना में दौड़ते रहे.
उसकी विचार श्रृंखला टूट गई जब कुणाल ने स्कूटर रोक कर कहीं बैठ कर चाय पीने की पेशकश की. मेज पर रखे चाय के प्यालों से उठता हुआ धुआं दोनों के बीच तैर रहा था. दोनों तरफ़ ख़ामोशी थी, लेकिन आंखें बोल रही थीं. जिसमें बैरे ने आकर दख़ल दे दी, जो गुलाब जामुन की प्लेट लेकर आया था. गुलाब जामुन की प्लेट देखते ही माधवी को झटका-सा लगा, क्योंकि मनोज को भी गुलाब जामुन बहुत पसंद थे. वह फिर अतीत में खोने लगी. अब उसकी नज़रे कुणाल की ओर न होकर प्याले की गरम-गरम चाय पर थीं.
कुणाल को ख़ामोशी खलने लगी तो उसी ने पहल की बोलने की, "आपने मेरे बारे में सब कुछ जान लिया है ना?"
माधवी ख़ामोश रही.
"मेरा मतलब है- हम दोनों को सब बातें साफ़-साफ़ कर लेनी चाहिए..."
माधवी ने भरपूर नज़रों से उसे देखते हुए सवाल किया, "तलाक़ के लिए दरख़्वास्त आपने दी थी या आपकी पत्नी ने?"
सपाट सा जवाब या कुणाल का, "मेरी बीवी ने. उसे मुझसे बहुत सी शिकायतें हैं. मैं उसके प्रति लापरवाह हू़, अपने काम के आगे उसकी फ़िक्र नहीं करता. ऐसी और भी दर्जनों शिकायत."
माधवी सोचने लगी क्या सचमुच इन बातों का कोई महत्व नहीं होता... क्या पुरुष की लापरवाही स्त्री का अपमान नहीं है. तनाव बढ़ता जा रहा था दिमाग़ में कि कुणाल के प्रश्न ने सोच को मोड दिया, "आपके मामले में पहल किसने की थी आपने या..."
कुणाल का सवाल अप्रत्याशित नहीं था. इस प्रश्न की उम्मीद उससे थी माधवी को, लेकिन वह सवाल सुनकर चुप रही. बस एक बार उसने कुणाल को उचटती हुई नज़रों से देखा और गर्दन झुका ली. जिससे ज़ाहिर था कि पहल उसी की थी.
कुणाल को इस बात से और राहत मिली और उसने आगे अपनी बात ज़ारी रखी, "मेरी बीवी ने तो मुझ पर यह आरोप भी लगाया है कि में उसे पीटता हूं, उस पर ज़ुल्म करता हूं, परंतु सच पूछो तो मैंने ऐसा कभी कुछ नहीं किया. दरअसल, उसने ऐसा इसलिए लिखा है जिससे कि उसे जल्दी से तलाक़ मिल जाए. और मुझे उसकी किसी बात से ऐतराज़ नहीं है. जब उसने मुझसे अलग होने का फ़ैसला कर ही लिया है तो मैं कर ही क्या सकता हूं. क्या फ़ायदा है कुछ कहने-सुनने का. लेकिन फिर भी मुझे यक़ीन है कि हम दोनों यानी मेरी पत्नी और मैं अभी भी एक साथ रह सकते हैं."
कहने को तो कुणाल ने बहुत बड़ी बात कह दी थी माधवी के मुंह पर जो उससे शादी तक करने को तैयार थी. लेकिन माधवी को उसकी बात से कोई चोट नहीं पहुंची. वह भी कुणाल की तरह यह नहीं सोच सकी कि अगर कुणाल का ख़्याल है कि वह अभी भी अपनी पत्नी के साथ रह सकता है तो मैं क्यों नहीं रह सकती. बल्कि इसके विपरीत वह यह सोच रही थी कि ऐसी कुछ बातें तो उसने भी लिखी है तलाक़नामे पर जैसी कुणाल की पत्नी ने, जबकि मनोज ने कभी उसके साथ दुर्व्यवहार नहीं किया.
माधवी के सोचने के तरीक़े ने उसके कछ ऊंचे मानसिक स्तर की होने का सबूत नहीं दिया, इसके विपरीत कुणाल ने अधिक समझदार, और बात को समझने की समझवाला होने का खुला परिचय दिया यह कहकर कि- "हमारे तलाक़ की वजह केवल इतनी है कि हम आपस में एडजस्ट नहीं कर पाए और हमारे रिश्तेदारों ने बजाय इसके कि समझा-बुझाकर मामला सुलझाते हमारे आपसी मतभेद को और बढ़ाने की कोशिश की."
माधवी को इन बातों को सुनकर अच्छा नहीं लगा. उसे ऐसा लगने लगा कि कुणाल उसके बारे में कुछ जानना ही नहीं चाहता कि उनके अलगाव का कारण क्या था. क्या वह ख़ुद नहीं सोच सकता कि आपसी समझौता न कर सकने की वजह से ही उसे भी मनोज से तलाक़ लेने को सोचना पड़ा.
ड्रामा देखकर लौटते समय कुणाल ने बताया, "मुझे घर मिल गया है. मैं एक-दो दिन में यहां से चला जाऊंगा.'
माधवी बुझी-बुझी सी आवाज़ में बोली, "मां का पत्र आया है. बुलाया है. दो-चार दिन में मुझे भी जाना होगा." माधवी सरासर झूठ बोली वी शायद इस झूठ के पीछे कुणाल की कही बातों का रोष दिखा था जिसे वह इस तरह व्यक्त कर रही थी.
कुणाल दूसरे दिन अपने मकान में चला गया और दो दिन के बाद माधवी भी लौट गई. माता-पिता के पास. धीरे-धीरे छह माह गुज़र गए. दोनों ही परिवार उनके तलाक़ के मुक़दमें के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे थे.
माधवी को पता चला कि कुणाल के मुक़दमे का फ़ैसला जल्दी ही होनेवाला है. लेकिन माधवी के मुक़दमे का फ़ैसला जल्दी होने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे. माधवी इस बात से परेशान रहने लगी कि कहीं ऐसा न हो कि कृणाल के मुक़दमे का फ़ैसला जल्दी हो जाए और माधवी का नहीं, तो वह अधिक दिन तक उसका इंतज़ार करेगा भी या नहीं. यह दुविधा की बात थी. कहीं ऐसा न हो कि वह अधिक इंतज़ार न कर सके और इस बीच और कोई लड़की उसे भा जाए और वह उससे शादी कर ले. अगर ऐसा हुआ तो उसका क्या होगा? वह कहां जाएगी फिर? सोच-सोच कर उसका मन व्याकुल होने लगता.
बेचैनी में कटते दिन-रात उसे विचार शून्य सा करते जा रहे थे. तभी एक दिन उसकी बहन का पत्र आया, जिसमें उसने लिखा था कि कुणाल की बीवी ने मुक़दमा वापस ले लिया है. उनकी ग़लतफ़हमियां ख़त्म हो गई हैं और फिर से एक साथ रहने का उन लोगों ने फ़ैसला कर लिया है. कुणाल अपनी बीवी को लेने गया है.
पत्र उसके हाथ से गिर गया. वह दोनों हाथों से चेहरा ढंक कर बैठ गई. उसी स्थिति में वक़्त का एक बोझिल सा टुकड़ा बीता और फिर वह आश्वस्त होकर उठी, श्रृंगार की मेज के पास जा कर एक पल अपने को दर्पण में निहारा और फिर माथे पर बिंदी लगाई तो उसकी आंखें चमक उठीं. फिर मांग में सिंदूर भरा और आईने में देखा तो उसका चेहरा ही नहीं अंग-अंग दमक रहा था. दूसरे पल वह अपने गले में मंगलसूत्र पहन रही थी.
- बशेषर प्रदीप
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