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कहानी- चालीस के बाद (Short Story- Chalis Ke Baad)

और सुबह होते अनीता ने सुधेंदु को फोन किया. सारी बातें सुन सुधेंदु स्तब्ध रह गया, यह क्या हो जाता है और कैसे हो जाता है. ख़ासकर चालीस की उम्र पार कर चुके पुरुषों में इस तरह का ख़तरनाक सम्मोहन क्यों बढ़ जाता है.

तीन बज चुके थे. सुधेंदु ने अभी-अभी लंच लिया था. खाने के बाद तबियत में भारीपन सा आने लगा था. आराम करने की इच्छा बलवती हो उठी थी, पर टेबल पर रखी चंद फाइलें अभी भी उसका इंतज़ार कर रही थीं. दो साल भी तो नहीं हुए थे वहां आए. प्रतिष्ठित पद और मुंहमांगे वेतन ने आख़िर उसके बरसों के सब्र का बांध तोड़ दिया था, पुरानी नौकरी के साथ पुराने शहर और घर-परिवार को छोड़ वह यहां आ ही बसा था.
पत्नी ने बहुतेरा समझाया, वो जवान होती बेटियों को लेकर भला वह कामकाजी महिला कैसे सब संभाल पाएगी अकेले, पर सुधेंदु पर एक ही धुन सवार थी. किसी भी हालत में एक मकान और एक मोटर तो लेनी ही लेनी है. पुरानी नौकरी खींच खांच कर चल रही थी, उसकी प्रतिभा की वहां कोई क़द्र न थी. रूटीन काम, आधे दिन से ज़्यादा छु‌ट्टी, वह ज़्यादातर वक़्त घर पर ही बिता देता. कामकाजी पत्नी को भी उसका घर से अधिकाधिक जुड़े रहना बड़ा ही राहत देता था. बच्चियों को स्कूल से लाने, ले जाने की ज़िम्मेदारी सुधेंदु की थी. सब्ज़ी, राशन की ज़िम्मेदारी सुधेंदु की थी. कुल मिलाकर एक ख़ुशहाल परिवार था. शांत और स्थिर जीवन, पर इस शांत झील में पहली कंकरी उसी दिन पड़ गई, जिस दिन सुधेंदु की पत्नी अनीता की छोटी बहन अपने पति-बच्चों के साथ अपनी नई कार में आई. उसका पति था बिज़नेसमैन, चंद बरसों में ही धनाढ्‌यों में शुमार हो गया था उसका नाम. अनीता और सुधेंदु कहने को तो दोनों कमाते थे, पर मिला-जुलाकर बस ठीक-ठाक चल रहा था. सुधेंदु के पास डिग्रियों की और प्रतिभा की कमी न थी, पर एक ही शहर में दोनों को मिली नौकरी ने उसे कहीं हाथ-पांव मारने न दिया. उन्नीस-बीस साल गुज़र चुके थे साथ प्रेमपूर्वक रहते. पर रीता और उसके पति के वैभव ने दोनों पति-पत्नी को अंदर ही अंदर कहीं हिला दिया, बेटियों का हसरत से उनकी कार को निहारना, छू-छूकर उनके कपड़े देखना, उनके सामान को आंखें फाड़कर देखना, यह सब कहीं न कहीं अनीता और सुधेंदु दोनों को छू गया था. उनके जाने के उपरान्त दोनों पति-पत्नी अपनी सारी जमा पूंजी का हिसाब करने बैठे, कुल मिलाकर भी एक नया मकान ख़रीदने की स्थिति में न थे. कार लेने का मतलब था मकान के प्लान को और कई सालों
तक मुल्तवी करना. जीवन के प्रवाह में उन्होंने जाने कब ख़ुद को निश्चिंत भाव से समर्पित कर दिया था. स्थिर और शांत भाव से ज़िंदगी की गाड़ी चली जा रही थी. पर अचानक मन में दबी इच्छाजों की पिटारी खुल गई थी और इस मन की पिटारी के भीतर छिपे दुनिया भर के दर्द-गुबार और कमियां-शिकवे अचानक निकल निकलकर बाहर आने लगे थे और अपनी हस्ती का एहसास कराने लगे थे इनकी ज़िंदगी में.
और तभी सुधेंदु एकदम से बनिया हो गया था. हर पल बैठे यही सोचा करता कितना जोड़ा और कितना पाया अब तक. "कितना और पाना है" की इच्छा सहसा सुरसा के मुंह की भांति बड़ी होती चली गई थी और उसमें समा गई थी उनकी शांत ज़िंदगी. आज सुधेंदु डायरेक्टर है इस इन्स्टीट्यूट का. कार, बंगला, चपरासी, बावर्ची सब कुछ है उसके पास. पर इन सुविधाओं को जीने के लिए उसका परिवार उसके पास नहीं है. जिनके लिए उसने ये सब किया वे अपनी ज़िंदगी की रूटीन तोड़कर उसके पास रहने नहीं आ सकते सिवाय छुट्टियों के. अनीता अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकती थी और बच्चियों का नाम उस प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल से हटा लेना मूर्खता के सिवाय और कुछ न था. लिहाज़ा दो साल से सबके सब छितराए से पड़े थे, सुधेंदु ने अपने घनिष्ठतम मित्र ठाकुर से आते-आते वादा लिया था कि उसकी अनुपस्थिति में वह उसके घर की देखभाल करता रहेगा और बीवी-बच्चों की पूछताछ करता रहेगा. वक़्त बेवक़्त आई परेशानियों में हल ढूंढ़ने वाला कोई तो था अन्यथा कहां-कहां मारी फिरती ये तीनों महिलाएं.
बीच में कई बार वह जाकर देख भी आया था. धीरे-धीरे सब कुछ व्यवस्थित हो गया था. घर की तरफ़ से निश्चिंत हुआ तो सुधेंदु ने अपनी स्थिति पर नज़र डाली. शाम तक तो संस्था के ढेरों व्यक्तियों, कर्मचारियों के बीच सिर उठाने की भी फ़ुर्सत न मिलती, पर बंगले पर लौटते ही एक उदासी सी घेर लेती.
ज़िंदगी का एक लंबा अरसा जिसने भरे-पूरे परिवार में बिताया हो उसकी शामें ऐसी सूनी हों और रात उदास, तो वह निश्चय ही छटपटा जाएगा, ज्यों-ज्यों यह उदासी, अकेलापन और छटपटाहट बढ़ती गई. सुधेदु थोड़ा खिन्न सा रहने लगा. फिर बैठकर बनियागीरी करने लगा. इतनी उपलब्धियों के लिए अपनी शांत और ख़ुशहाल ज़िंदगी की क़ीमत देकर क्या उसने सचमुच कुछ हासिल किया? या जुटा आया एक अनजाना सुख? क्या उसकी अपनी ज़िंदगी का कुछ मोल नहीं? क्या उसे ख़ुश रहने का हक़ नहीं? और इन्हीं चिंतनों से गुज़रता, शहर के लोगों से धीरे-धीरे घनिष्ठता बढ़ाता वह एक क्लब का सदस्य भी हो गया. एक साल होते न होते वह अपनी ज़िंदगी, अपनी इच्छानुसार बिताने लगा. अब समय काटने को न दौड़ता था. उसने हिस्सों में बांट दिया था अपने जीवन को, छुट्टियों में वह अनीता और बच्चियों का होता था. और छुट्टियों के बाद नीलोफर के साथ उसकी अपनी ज़िंदगी, अपने घंटे, अपनी फ़ुर्सते.
ऐसी ही फ़ुर्सत की एक सुबह फोन की घंटी अचानक घनघनाने लगी. उसने दरबान को छोड़ बावर्ची और चपरासी सभी को छुट्टी दे रखी थी. अलसाया सा उसने फोन की ओर देखा, सुबह-सुबह सुधेंदु की अनुपस्थिति में पितृ तुल्य, चालीस-पैंतालीस की उम्र पार कर गया ठाकुर जाने कब और कैसे सुधेदु की अठारह वर्षीया बेटी को अपने सम्मोहन जाल में फंसा गया.
किसका फोन हो सकता है. कल रात ही तो अनीता और बेटियों से बात हुई. इंस्टीट्यूट में आज छु‌ट्टी थी इसलिए उधर के किसी काम का फोन होना नहीं चाहिए. फोन उठाए या न उठाए कुछ देर सोचता रहा, फिर हाथ बढ़ाकर उठा लिया, "शिप्रा को रात बुखार था, कहीं बढ़ तो नहीं गया?
"हेलो, सुधेंदु स्पीकिंग."
उधर से अनीता की घबराई हुई आवाज़ आई, "सुधेदु मैं
अनीता..." और कहते-कहते उसका गला रुंघ गया. सुधेंदु घबरा गया.
"क्या बात है, क्या हुआ, जल्दी बतलाओ..." कई सवाल एक सांस में पूछ गया. अनीता धीरे-धीरे सामान्य हुई और उसने जो कुछ सुधेंदु को बताया वह उसे न सिर्फ़ चौंका गया, वरन कई प्रश्न खड़े कर गया.
सुधेंदु की अनुपस्थिति में पितृ-तुल्य, चालीस-पैंतालीस की उम्र पार कर गए ठाकुर जाने कब और कैसे सुधेंदु की अठारह वर्षीया बेटी को अपने सम्मोहन जाल में फंसा लिया. अनीता को तो सपने में भी गुमान न था कि 'अंकल अंकल' कह कर अंकल पर लट्‌टू होने वाली यह छोटी सी बच्ची इस तरह गुमराह हो जाएगी कि घर में ही खुला विद्रोह कर बैठेगी.
रात ठाकुर घर पर ही ठहर गया था. छोटी बेटी शिप्रा को इतना ज़्यादा टेंपरेचर था कि अनीता को भी उसका रुकना उचित लगा. जाने कब डॉक्टर बुला लाने की ज़रूरत हो. ठाकुर के पास गाड़ी भी थी. सबने मिलकर सुधेंदू से रात में बातें की. डॉक्टर की दी हुई दवा शिप्रा को दे सभी सोने चले गए. अनीता शिप्रा के साथ थी. रात में शिप्रा को पानी देने जो उठी तो सोचा शिखा को देखती चलू, शिखा अपने कमरे में न थी. ड्रॉइंगरूम में जाकर जो देखा तो पैर के नीचे की धरती खिसक गई. माथा पीट लिया. शिखा को बुरा-भला तो कहा ही, ठाकुर को भी सौ गालियां दीं. यह इस उम्र में... और वह भी बेटी की उम्र की लड़की के साथ इस तरह का रिश्ता, छिः छिः ख़ूब बवाल मचाया अनीता ने, पर शिखा ने विद्रोह की बिगुल ही बजा दी, "मैं अंकल के साथ रहना चाहूंगी."
और सुबह होते अनीता ने सुधेंदु को फोन किया. सारी बातें सुन सुधेंदु स्तब्ध रह गया, यह क्या हो जाता है और कैसे हो जाता है. ख़ासकर चालीस की उम्र पार कर चुके पुरुषों में इस तरह का ख़तरनाक सम्मोहन क्यों बढ़ जाता है.
"में आज ही चलता हूं." कहकर उसने हताश होकर रिसीवर रख दिया और मुड़कर अपने बिस्तर की ओर देखा, नींद में नीलोफर बड़ी ही प्यारी दिख रही थी.
- डॉ. मंजू सिन्हा

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