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कहानी- बस एक बार (Short Story- Bas Ek Baar2)

वह आज फिर मम्मी से कहेगी. लेकिन कैसे कहे, मम्मी से तो डर लगता है. वह तो आजकल बहुत गंभीर रहती हैं. अब तो मम्मी-पापा पर ग़ुस्सा भी आने लगा था. छिः इतने बड़े हो गए और लड़ाई करते हैं...

आज चिंकी बहुत उदास थी. मम्मी स्वेटर बुनने में लगी थीं. उन्हें तो जैसे उसकी कोई परवाह ही नहीं थी. इतने दिन हो गए नाना-नानी के घर आए हुए, पर पता नहीं क्यों मम्मी अपने घर वापस जाने का नाम ही नहीं लेतीं. उसे कभी-कभी मम्मी पर बहुत ग़ुस्सा आता.
"चिंकी दूध पी लो, चिंकी पढ़ाई कर लो..." यही सब कहकर निश्चिंत हो जाती हैं. उन्हें क्या पता कि उसे पापा के बिना कितना बुरा लगता है. जब वह अपने घर पापा के पास थी तो पापा उसे कितना प्यार करते थे. ऑफिस से आते ही चिंकी को ढूंढ़ते. रोज़ टॉफी, बिस्किट लाते. पिछली दीवाली पर पापा की लाई हुई फ्रॉक कितनी प्यारी थी, उसे पहनकर वह बिल्कुल गुड़िया सी लगती, वह हमेशा पापा की गोद में ही रहना चाहती थी. कभी-कभी वे खीझ भी जाते, लेकिन फिर भी उसे प्यार से गोद में उठा ही लेते. पर अब पापा कितनी दूर हैं. उन्हें तो देखे हुए भी बहुत दिन हो गए, फिर उसका जन्मदिन भी तो आ रहा है. नानी कहती हैं, "साल बीतने को है." यानी मम्मी के साथ वह साल भर पहले जनवरी में नानी के घर आई थी और अब दिसंबर बीतने को है.
उसे याद है, पहले जब कभी वह मम्मी के साथ नानी के घर आती थी तो मम्मी कितनी ख़ुश रहती थीं. वह और पापा चहकते हुए सफ़र तय करते. मम्मी नाना-नानी, मामा-मामी वगैरह के लिए ढेर सारी चीज़ें ख़रीदतीं, ट्रेन में रास्ते भर मम्मी चिंकी को ख़ूब प्यार करतीं. पापा भी उससे प्यारी-प्यारी बातें करते, लेकिन इस बार न जाने क्या हुआ? मम्मी ने एकदम से ही जाने का प्रोग्राम बना लिया. जाने से पहले दो दिन तक पापा से बात भी नहीं की.

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पापा भी उखड़े उखड़े से रहे. उसे तो कुछ समझ में नहीं आया, पता नहीं क्यों, पापा-मम्मी दोनों ही कुछ नाराज़ से लगे. फिर मम्मी ने एक सूटकेस में अपना और चिंकी का सामान रखा और पापा को छोड़कर उसकी नन्हीं उंगली पकड़ रेलवे स्टेशन चली आईं. मम्मी का इस तरह जाना देखकर वह पापा के बारे में कुछ बोलना चाहती थी, पर मम्मी का ग़ुस्से से भरा चेहरा देखकर उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ी. सच, कभी-कभी उसे मम्मी से बहुत डर लगता था. पापा की तो बात ही कुछ और थी. कुछ भी शैतानी करो, पापा कभी नाराज़ नहीं होते थे. लेकिन मम्मी तो बस छोटी-छोटी बातों पर भी डांट लगा देती थी. पापा होते तो रास्ते में आइस्क्रीम ज़रूर दिला देते. पर इस बार मम्मी ने ट्रेन में उससे प्यार भरी बातें भी नहीं कीं. बस, ग़ुस्से में तनी पूरे रास्ते भर एक किताब पढ़ती रहीं. उससे बात भी नहीं की. वह कुछ पूछती भी तो मम्मी उसे घुड़क देतीं. हर बार की तरह इस बार भी नानी का घर तो आ गया, लेकिन कहीं कोई उत्साह नहीं था. हां, नाना-नानी के घर ख़ूब सारे खिलौने रखे हैं और वह बोलने वाली गुड़िया भी, यह याद कर उसकी आंखें ज़रूर चमक उठी थीं.
नानी तो मम्मी और उसे अचानक देखकर चौंक ही गई थीं. नाना भी कुछ चिंतित से लगे. नानी ने पहले मम्मी से अचानक आने का कारण पूछा, फिर खैरियत पूछी. मामा, मौसी वगैरह भी सहमे हुए चुप-चुप से थे. न जाने क्यों, सदा की तरह उस पर किसी का ध्यान ही नहीं गया, फिर पता नहीं बंद कमरे में नाना-नानी और मम्मी क्या गिटपिट करते रहे. कभी मम्मी की ग़ुस्से भरी आवाज़ सुनाई पड़ी, तो कभी सधी हुई. पता नहीं माजरा क्या है? इन बड़ों की बात तो बड़े ही जानें, न जाने इन्हें अचानक ही क्या हो जाता है. वह तो दूसरे कमरे में खिलौने की टोकरी में उलझ चुकी थी. उसे खिलौने बहुत अच्छे लगते हैं. बोलने वाली मुस्कुराती गुड़िया तो बहुत ही प्यारी लगती है. कभी भी ग़ुस्सा नहीं होती और न ही कभी रोती और किसी से लड़ती.

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लेकिन इन खिलौनों से खेलते-खेलते न जाने कितने दिन बीत गए. अब तो उसे बोरियत होने लगी थी. उसे अपना घर याद आता. अपने नन्हें-मुन्ने दोस्त याद आते, प्यारे प्यारे पापा याद आते, अपना कमरा, अपने पुराने खिलौने याद आते.
न जाने कब वापस जाएंगी मम्मी, वह सोच-सोचकर मायूस हो जाती. एक बार पूछा भी था मम्मी से कि पापा के पास कब जाएंगे. लेकिन वह कुछ नहीं बोलीं. नाना-नानी भी बात टाल देते. मौसी उसे बहलाकर घुमाने ले जाती. मामा उसे चॉकलेट देकर चुप करा देते. अपनी-अपनी तरफ़ से सभी उसे ख़ुश रखने की कोशिश करते, लेकिन फिर भी वह उदास ही रहती. उसे कुछ समझ में नहीं आता. हां, नानी को उसने यह कहते ज़रूर सुना था कि पापा-मम्मी में ठन गई है. दोनों ने आपस में कुट्टी कर ली. यह सुनकर वह सोच में पड़ गई. घर में कभी-कभी पापा-मम्मी आपस में ज़ोर-ज़ोर से बोलते तो ज़रूर थे, लेकिन फिर दोनों में दोस्ती हो जाती. पर इस बार तो काफ़ी दिनों तक लंबी कुट्टी हो गई. नाना अदालत-मुक़दमा वगैरह कह रहे थे, लेकिन यह सब क्या होता है, उसे तो मालूम भी नहीं. उसे तो बस कु‌ट्टी की चिंता है. यदि मम्मी-पापा की दोस्ती अभी भी नहीं हुई तो उसके जन्मदिन पर पापा कैसे आएंगे? कुछ ही दिन तो रह गए हैं. नहीं, वह पापा के बिना जन्मदिन नहीं मनाएगी. उसके लिए फ्रॉक कौन लाएगा? उसे तो बस पापा की ही दी हुई फ्रॉक चाहिए.

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वह आज फिर मम्मी से कहेगी. लेकिन कैसे कहे, मम्मी से तो डर लगता है. वह तो आजकल बहुत गंभीर रहती हैं. अब तो मम्मी-पापा पर ग़ुस्सा भी आने लगा था. छिः इतने बड़े हो गए और लड़ाई करते हैं. पिछली बार पड़ोस के मोनू से उसका झगड़ा होने पर मम्मी ने ही तो कहा था कि अच्छे बच्चे लड़ते नहीं. फिर मम्मी-पापा ख़ुद क्यों लड़े? वे सचमुच गंदे बच्चे हैं. वह तो इतनी समझदार हो गई है, पर पापा-मम्मी अभी तक नासमझ हैं. शेम-शेम! चिंकी बुदबुदा उठी. वह आज ही मम्मी से कहेगी. अब डरेगी नहीं. मम्मी ही तो कहती थी कि सच्ची बात कहने में डरना नहीं चाहिए. वह आज मम्मी के हाथ से बुनाई छीन लेगी और पापा से दोस्ती कर लेने को कहेगी. सचमुच कितना अच्छा हो, अगर मम्मी मान जाए, फिर तो पापा भी मान जाएंगे. वह अच्छे से अपना जन्मदिन मनाएगी और मम्मी-पापा के साथ फिर से अपने घर चली जाएगी. अपने बिछुड़े दोस्तों से मिलेगी, अपने खिलौनों से खेलेगी. रोज़ पापा की गोद में चढ़ेगी और मम्मी की बात कभी नहीं टालेगी. समय पर होमवर्क पूरा कर लेगी, हर बात मानेगी. बस, एक बार मम्मी मान जाए, बस एक बार... चिंकी की आंखों में सपने तैरने लगे थे.
- विभावरी सिन्हा

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