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कविता- मन मंथन (Poetry- Mann Manthan)

मन को जो इतना मथा है

हृदय में तेरे कितनी व्यथा है

अब खोल दे बांहें

यूं भर ना तू आहें

कांटों की जो ऊपरी सतह है

जीवंत प्रेम उसमें अथाह है

नयन नीर को अब बहने दे

अधरों को भी कुछ कहने दे

जो निकलेगा मन का गुबार

तभी खुलेगा ख़ुशियों का द्वार

मन के मौन का समंदर

छलकने दे अब अपने अंदर

क्यूं दिल इतना टूट गया

कब अपना था जो छूट गया

बहुत सह लिया मन का पीड़

तोड़ दे अब ज़ख़्मों का तीर

- कुमारी बंदना

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Photo Courtesy; Freepik

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