बस अब और नाटक नहीं. लगा भाभी से लिपटकर ख़ूब रो लूं और बता दूं कि नर्क में रहती हूं, बिना दवा खाए नींद नहीं आती… इतनी घुटन, इतना अकेलापन, सब अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है, बस नाम की ज़िंदा हूं…
इस बार निम्मी की क्लास टीचर ज़्यादा ही नाराज़ थीं,
"क्या बात है मिसेज़ पंत? आपको नोटिस भी भेजा गया था कि आज मम्मी और पापा दोनों को आना है तब भी निम्मी के फादर नहीं आए… व्हाई डज़ ही नेवर अटेंड ऐनी पीटीएम?"
मैंने कनखियों से निम्मी की ओर देखा, दूसरे बच्चों के साथ बात कर रही थी…
क्या कहूं इनसे कि टीवी पर मैच देखना इनके लिए पीटीएम से ज़्यादा ज़रूरी था, उलझन में थी कि मुखौटा आकर चेहरे पर लग गया.
"क्या है ना मैम.. हम दोनों आने वाले थे.. ऑफिस से अचानक फोन आया और.. वैसे इनका बहुत मन था आने का…"
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मैंने मुखौटे को कृतज्ञता से देखा, आज फिर बचा लिया!
इसीलिए इसको हमेशा अपने साथ रखती हूं, ये बड़ी आसानी से मेरी बदसूरत ज़िंदगी को ढंक लेता है. मेरे रिसते घाव आज तक कोई भी नहीं देख पाया है. सच ये है कि मनीष और मेरी ना के बराबर बातें होती हैं. हम साथ कहीं नहीं जाते हैं… छोटी छोटी बातों पर वो चिल्लाने लगते हैं और वो ऐसी भाषा में कि…
अक्सर सहेलियां कुरेद देती हैं, "क्या सुमि, तुम अकेले बाज़ार क्यों जाती हो. मनीष नहीं जाना चाहते हैं क्या?"
"अरे बहुत ज़िद करते हैं, लेकिन मैं नहीं जाती इनके साथ… इतने महंगे कपड़े दिला देते हैं ना.. पूछो मत." मुखौटा बात संभाल लेता है.
"सुनिए, भइया का फोन आया था… हम सबको रात को खाने पर बुलाया है…"
"मेरा खाना बनाकर रख जाना… मैं नहीं जाऊंगा."
खाना खाते, बात करते बहुत देर हो गई थी. निम्मी सो गई थी. भाभी ने वहीं रोक लिया. क़रीब दो बजे भाभी कमरे में आईं.
"सुमि, तुम अब तक सोई नहीं?.. कोई बात है क्या? चेहरा भी कितना उतरा हुआ रहता है… बोलो ना…"
बस अब और नाटक नहीं. लगा भाभी से लिपटकर ख़ूब रो लूं और बता दूं कि नर्क में रहती हूं, बिना दवा खाए नींद नहीं आती… इतनी घुटन, इतना अकेलापन, सब अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है, बस नाम की ज़िंदा हूं…
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तब तक कोई बोल पड़ा, "कोई बात नहीं है भाभी. मनीष देर रात तक टीवी देखते हैं. मुझे भी वहीं बैठाए रखते हैं. मन किया तो आधी रात को मुझे लॉन्ग ड्राइव पर लेकर निकल पड़ते हैं… बस वही सब आदत हो गई है देर-सबेर सोने-जागने की…"
मुझे पता ही नहीं था, मुखौटा यहां भी मेरे साथ आया था!..
- लकी राजीव
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